सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
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डॉलर के मुकाबले 95 के करीब फिसला रुपया: जानिए करेंसी में गिरावट की वजह और आप पर असर

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 95 के करीब कारोबार कर रहा है। कच्चे तेल की तेजी और विदेशी बिकवाली के बीच समझिए आरबीआई के कदम और इसका आपकी जेब पर असर।

करेंसी – भारतीय रुपये के नोट और अमेरिकी डॉलर की सांकेतिक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर — फोटो: rupixen / Pixabay

अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय मुद्रा पर दबाव एक बार फिर गहरा गया है और रुपया 94.90 से 95 रुपये प्रति डॉलर के नाजुक दायरे में कारोबार कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी ने घरेलू करेंसी पर यह बोझ बढ़ाया है। स्थिति को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप कर रहा है।

रुपये में कमजोरी के पीछे कौन से बड़े कारण हैं?

करेंसी बाजार में रुपये के फिसलने के पीछे घरेलू से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। मौजूदा समय में तीन प्रमुख कारक रुपये की सेहत को प्रभावित कर रहे हैं:

  • कच्चे तेल में तेजी: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड 113 से 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसके भुगतान के लिए भारी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता पड़ती है।
  • विदेशी पूंजी की निकासी: अमेरिका में बॉन्ड यील्ड मजबूत होने और वैश्विक अनिश्चितता के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसे निकाल रहे हैं। इक्विटी बेचकर डॉलर वापस ले जाने से घरेलू बाजार में डॉलर की मांग बढ़ जाती है।
  • डॉलर इंडेक्स की मजबूती: दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर का सूचकांक लगातार मजबूत बना हुआ है, जिससे केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी पर दबाव देखा जा रहा है।

आरबीआई ने करेंसी को संभालने के लिए क्या कदम उठाए?

रुपये की तेज गिरावट रोकने के लिए केंद्रीय बैंक कई मोर्चों पर काम कर रहा है। रिजर्व बैंक ने सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए एक विशेष डॉलर विंडो शुरू की है, ताकि तेल कंपनियां खुले बाजार से एक साथ भारी डॉलर न खरीदें और मुद्रा विनिमय दर में अचानक बड़ा झटका न लगे।

इसके अलावा, सट्टेबाजी को सीमित करने के उद्देश्य से विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव्स और हेजिंग के नियमों को कड़ा किया गया है। केंद्रीय बैंक सीधे स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर बेचकर भी रुपये को सहारा दे रहा है। हालांकि, इस निरंतर दखल का असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है। सितंबर के पहले हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 785.71 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जो अक्टूबर के मध्य तक घटकर करीब 721 अरब डॉलर के स्तर पर आ गया है।

मुद्रा बाजार और रिजर्व के प्रमुख आंकड़े

पैमानावर्तमान स्थिति / आंकड़ा
डॉलर के मुकाबले रुपयालगभग 94.90 से 95.00 प्रति डॉलर
ब्रेंट क्रूड ऑयल कीमतलगभग 113 - 114 डॉलर प्रति बैरल
विदेशी मुद्रा भंडार (अक्टूबर)लगभग 721 अरब डॉलर
सर्वकालिक रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार785.71 अरब डॉलर (सितंबर 2026)
आरबीआई का प्रमुख उपायऑयल कंपनियों के लिए स्पेशल डॉलर विंडो और डेरिवेटिव्स पर नियम

आम नागरिक की जेब और घरेलू बजट पर क्या होगा असर?

करेंसी में आने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन और घरेलू बजट पर पड़ता है:

  • महंगाई का जोखिम: रुपये के कमजोर होने से आयात होने वाले सामान, जैसे कि खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रसायन और कच्चे माल महंगे हो जाते हैं। जब कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे इसका भार ग्राहकों पर डालती हैं।
  • विदेश में पढ़ाई और यात्रा: यदि आपका बच्चा विदेश में पढ़ाई कर रहा है, तो ट्यूशन फीस और रहने का खर्च सीधे बढ़ जाता है, क्योंकि एक-एक डॉलर खरीदने के लिए अब ज्यादा रुपये चुकाने होंगे। इसी तरह विदेश घूमने की योजना भी महंगी हो जाती है।
  • ईंधन और माल ढुलाई: महंगा कच्चा तेल देश में परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ा सकता है, जिससे अंततः फल, सब्जियां और दैनिक उपभोग की चीजें महंगी होने का खतरा रहता है।
  • निर्यातकों के लिए मिलाजुला रुख: आईटी और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों को डॉलर में भुगतान मिलने से कागजी फायदा जरूर दिखता है, लेकिन वैश्विक मांग में सुस्ती और आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ने से यह लाभ सीमित रह जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रुपये के गिरने से भारत में चीजें महंगी क्यों होने लगती हैं?

भारत पेट्रोलियम, खाद, खाद्य तेल और कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे दूसरे देशों से आयात करता है। इन सभी का भुगतान अमेरिकी डॉलर में होता है। रुपया कमजोर होने पर उसी सामान के लिए अधिक रुपये देने पड़ते हैं, जिससे देश के भीतर इन सामानों की खुदरा कीमतें बढ़ जाती हैं।

क्या रिजर्व बैंक रुपये की विनिमय दर को किसी तय स्तर पर रोक सकता है?

रिजर्व बैंक रुपये का कोई तय स्तर निर्धारित नहीं करता, बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव और अफरातफरी को रोकना होता है। केंद्रीय बैंक मुद्रा भंडार का उपयोग तब करता है जब गिरावट बहुत तेज और अनियंत्रित होने लगे।

कमजोर करेंसी का सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलता है?

कमजोर रुपये का फायदा उन कारोबारों को मिलता है जो देश से बाहर सेवाएं या उत्पाद निर्यात करते हैं और उनकी आमदनी डॉलर में होती है, जैसे सॉफ्टवेयर कंपनियां और फार्मास्युटिकल निर्यातक। इसके अलावा विदेश से भारत में अपने परिवार को पैसे भेजने वाले अनिवासी भारतीयों (NRIs) के परिजनों को रुपये में अधिक राशि मिलती है।

Ashish

संपादक, खबर केंद्र